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अंग्रेजों ने हमें ग्रिगेरियन कलेण्‍डर दिया और हम उसे सीने से चिपकाकर बैठ गए हैं, लेकिन हमारे त्‍योहारों ने उसे मानने से मना कर दिया, परिणाम यह हुआ है कि आज हम हर घटना को अंग्रेजी तारीख से देखना चाहते हैं, लेकिन कुछ महत्‍वपूर्ण घटनाएं तिथियों के हिसाब से नहीं हो रही हैं।

अंग्रेजी तारीख जहां एक मध्‍यरात्रि से दूसरी मध्‍यरात्रि के बीच का समय बताती है, वहीं विक्रम संवत् का कलेण्‍डर की तिथि हमें सूर्य और चंद्रमा के बीच का एंगुलर डिस्‍टेंस बताती है। यही कारण है कि किसी समय तिथि बढ़ जाती है, क्‍योंकि तिथि समाप्‍त होने से पहले अगले दिन का सूर्योदय हो जाता है और किसी समय तिथि घट जाती है क्‍योंकि एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच तिथि शुरू होकर खत्‍म भी हो जाती है।

इस बार जन्‍माष्‍टमी के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। तिथि के अनुसार 2 सितम्‍बर और 3 सितम्‍बर को जन्‍माष्‍टमी है, क्‍योंकि तिथि का विस्‍तार अगले दिन सूर्योदय के बाद भी रहेगा। ऐसे में जन्‍माष्‍टमी किस दिन मनाई जाए।

आमतौर पर सूर्योदयी तिथि लेने वाले लोग जिस दिन सूर्योदय के समय तिथि हो, उसी तिथि को सही मानते हैं, यह एकादशी और दूसरे दिन में किए जाने वाले आयोजनों के लिए तो ठीक है, लेकिन जन्‍माष्‍टमी में एक शर्त और जुड़ी हुई है।

भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्‍म अष्‍टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्धरात्रि में होता है। यह तीनों शर्तें 2 सितम्‍बर को पूरी हो रही हैं। ऐसे में जन्‍माष्‍टमी 2 सितम्‍बर को ही मनाई जानी चाहिए।

अब अगले दिन 3 सितम्‍बर को अष्‍टमी शाम सात बजे तक रहेगी और रोहिणी नक्षत्र शाम आठ बजे तक समाप्‍त हो जाएगा। ऐसे में हमें पूरे दिन तो अष्‍टमी और रोहिणी नक्षत्र मिल रहे हैं, लेकिन अर्द्धरात्रि नहीं मिल रही है।

अगर कान्‍हाँ का जन्‍म मनाना है तो 2 की रात को ही मनाया जा सकता है, सूर्योदय का इंतजार नहीं किया जा सकता, लल्‍ला तो आधी रात आ चुका होगा।

आगे श्रीकृष्‍णचंद्र की जय… दोनों दिन उत्‍सव मनाया जाए तो भी बुरा नहीं, सदा दीवाली संत की, आठों प्रहर आनंद।


भगवान श्रीकृष्‍ण की कुण्‍डली का विश्‍लेषण