थायराइड के लिए अश्वगंधा Thyroid

थायरॉयड, गर्दन में स्थित एक ग्रंथि होती हैं और वह थायरोक्सिन नाम के हार्मोन का उत्पादन करती हैं, जो शरीर की चयापचय प्रक्रिया को विनियमित करने में मदद करता है।

थायरोक्सिन हार्मोन (हाइपोथायरायडिज्म) की कमी से बच्चों में बौनापन और वयस्कों में सबकटॅनेअस चर्बी बढ़ जाती हैं और अतिरिक्त (हायपरथायरोडिझम) हार्मोन गण्डमाला का कारण बनता हैं। हायपरथायरोडिझम की स्थिति 30 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं में ज्यादा पायी जाती हैं।

इसके लक्षणों में, गुस्सा, ज्यादा चिंता, दिल के धडकन की तेज दर, गहरा या उथला श्वसन, मासिक धर्म में बाधा, थकान और उभरी हुई आँखें आदि दिखते हैं। हालांकि यह सभी लक्षण एक साथ प्रकट नहीं हो सकते हैं, उनमें से कोई एक हायपरथायरोडिझम का संकेत हो सकता हैं।

थायरोक्सिन की निष्क्रियता के कारण हाइपोथायरायडिज्म हो सकता हैं। आयोडीन की कमी या थायराइड विफलता के कारण थकान, सुस्ती और हार्मोनल असंतुलन होता है। अगर अनुपचारित छोड़ दिया जाये, तो यह मायक्झोएडेमा का कारण बन सकती हैं, जिसमें त्वचा और ऊतकों में सूजन होती हैं।

आयुर्वेदिक उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली अश्वगंधा, जड़ी बूटी इस रोग के दोनों रूपों, हायपर और हायपो के लिए जवाब साबित हो सकती हैं। यह भारत, अफ्रीका और भूमध्य सागर के सूखे क्षेत्रों में बढ़ती हैं और इसका लैटिन नाम विथानिआ सोमनिफेरा हैं।
नीचे चार कारण दिये गये हैं, जिस के कारण इसका इस्तेमाल थाइराइड के लिए किया जा सकता हैं।

1-यह आपके शरीर के साथ काम करती हैं, उसके खिलाफ नहीं।

2-यह एक एडाप्टोजेन है, एक हर्बल उत्पाद, जो शरीर को तनाव, आघात, चिंता और थकान के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता हैं। एडाप्टोजेन एक पुनः निर्माण करने वाली जड़ी बूटी हैं, आयुर्वेदिक संदर्भ में ‘रसायना’ और बलवर्धक है।

यह पुष्टिकारक औषधि (टॉनिक) जड़ी बूटी भी है और नियमित रूप से ली जा सकती है। और वह अंतःस्त्रावी प्रणाली (हार्मोन) को ठीक भी करती है, जिससे व्यक्ति को हार्मोनल संतुलन की पुनःप्राप्ति होने में मदद मिलती है, और बेहतर महसूस होता है।

3-अश्वगंधा का उपयोग कर रहे व्यक्तियों के उपाख्यानात्मक सबूत और वास्तविक अनुभव यह दर्शाते हैं कि एडाप्टोजेन सभी प्रकार के लोगों पर, इतना ही नहीं, विशेष बीमारी के चरम से पीड़ित लोगों पर भी कारगर हैं। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति इसे एक मंद थाइराइड को सही करने के लिए ले सकता है, जबकि दूसरा इसका उपयोग अपने अति सक्रिय थाइराइड के इलाज के लिए ले सकता है।

4-वैज्ञानिकों को इन निरीक्षणों ने चौका दिया है, क्योंकि इसका शरीर पर एक समग्र प्रभाव है। अलग और तटस्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को, इस बड़ी पहेली को हल करना मुश्किल लगता हैं।

यह जड़ी बूटी एक टॉनिक के रूप में हजारों वर्षों से इस्तेमाल की जा रही है, इसलिए इसको एक व्यक्ति दीर्घ अवधि के लिए, किसी दुष्प्रभाव की संभावना के बिना उपयोग कर सकता है।

प्रति दिन 200 से 1200 मिलीग्राम की छोटी सी खुराक आपको लेनी चाहिए। यदि गंध अनचाही है, तो यह एक चाय के साथ मिलाकर जिसे उत्तेजक गर्म पेय बनाने के लिए तुलसी मिलायी जा सकती है या सूथी (ताजे फलो के रस के साथ आईसक्रीम, दही या दूध मिलाकर बनाया एक गाढा मुलायम पेय) में लिया जा सकता है।

उपचार प्रभावी हो रहा है, यह निर्धारित करने के लिए अपने थायराइड हार्मोन की जाँच करना और 2 से 3 महीने की अवधि के बाद एक सकारात्मक बदलाव के लिए उनकी फिर से जाँच कराना एक सर्वोत्तम तरीका हैं।

किसी भी मामले में, अगर आप अश्वगंधा का उपयोग शुरू करना चाहते हैं, तो अपने परिवार के चिकित्सक के साथ पहले इसके बारे में चर्चा करना एक अच्छा विचार हैं।

लेखक-संजय बी साह