मौसम का पूर्वानुमान वर्ष 2016
Weather Forecast 2016

तीतर पंखी बादळी विधवा काजळ रेख, आ बरसे वा घर करै, इमैं मीन न मेख। घाघ और भड्डरी की यह कहावत मौसम के बारे में है कि तीतर के पंखों की तरह आसमान के बादलों का स्‍वरूप हो तो वे अवश्‍य बारिश करते हैं, इसी प्रकार जो विधवा अपनी आंखों में काजल लगाने लगे, उसका पुनर्विवाह निश्चित है। इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए।

लोक कहावतों में घाघ भड्डरी की कहावतें सर्वाधिक प्रचलित है। इसके साथ ही आंचलिक मान्‍यताएं भी अपने अपने स्‍तर पर स्‍थानीय मौसम का पूर्वानुमान करने का प्रयास करती हैं। भारत में मानसूनी हवाएं कृषि का मुख्‍य आधार हैं। यही हवाएं तय करती हैं कि इस साल देश में कितना अन्‍न होगा। राजस्‍थान में मानसून का प्रवेश हर वर्ष 22 जून के आस पास होता है। ऐसे में 22 जून से करीब ढाई तीन महीने पहले आने वाली अक्षय तृतीयाा के दिन मौसम केे पूर्वानुमान के कई प्रयास किए जाते हैं। इनमें प्रमुख है बीकानेर की पतंगबाजी और जोधपुर केे घांची समाज का धार्मिक अनुष्‍ठान।

बीकानेर में अक्षय तृतीया के दिन जमकर पतंगें उड़ती है। रेगिस्‍तान के ठीक बीचों बीच बसे इस शहर में इंदिरा गांधी नहर आने से पहले पानी दूध से अधिक महंगा रहा है। किसी गांव में जाते तो वहां दूध, छाछ और घी आसानी से मिल जाते, लेकिन पानी मिलना मुश्किल होता। ऐसे में पानी की हर बूंद इस क्षेत्र के लिए अमृत की बूंद के समान रही है। मानसून के दौरान कितना पानी बरसेगा और कैसा जमाना होगा, यह जानने के लिए बुजुर्गों ने अक्षय तृतीया पर पतंगबाजी का निर्णय किया। हालांकि वैशाख सुदी द्वितीया को बीकानेर स्‍थापना दिवस से भी जुड़ा है, लेकिन अधिक महत्‍व अक्षय तृतीया का ही है। इस दिन पतंगबाजों के साथ हवा केे रुख को देख भविष्‍यवक्‍ता यह बताने का प्रयास करते हैं कि मौसम कैसा रहेगा। सामान्‍य तौर पर बीकानेर में अक्षय तृतीया को दिन में कई बार हवाओंं का रुख बदलने, दोपहर के समय हवा बंद रहने और शाम के समय अंधड़ आने पर यह माना जाता है कि आगे जमाना अच्‍छा रहेगा।

इस बार हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की ओर ही बना रहा, दिन में हवाओं का रुख नहीं बदला और दोपहर के समय भी तेज हवा चलती  रही। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2016 में मानसून का प्रभाव अच्‍छा नहीं होगा, चूंकि पश्चिमी हवाएं थी, सो बादलों की उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यहां जमाना अच्‍छा होने की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है। पशुओं के चारे लायक बारिश होने की गुंजाइश है। यह मेरा निजी अनुभव है कि जिस साल अक्षय तृतीया की शाम को अंधड़ नहीं आया है, उस साल बीकानेर में जमाना यानी मानसून के दौरान अच्‍छी बारिश भी नहीं हुई है।

जोधपुर के घांची समाज में एक अनुष्‍ठान कर मौसम का पूर्वानुमान किया जाता है। अनुष्‍ठान के तहत सात प्रकार के अनाज का ढेर मिट्टी पर लगाया जाता है। उसमें एक लकड़ी के खंभे पर दो देसी बबूल के लंबे सूल ऊपर के छोर पर मजबूती के साथ बंधे होते हैं। यह खंभे के ढेर में सीधा स्थापित किया जाता है। सूल ऊपर की तरफ रहते हैं और दोनों बच्चों को पवित्र जल से नहलाकर, तिलक लगाकर व मौली बांधकर खंभे के दोनों तरफ खड़ा किया जाता है। इस दौरान दोनों के हाथ में दो लंबी बांस पट्टियों का एक-एक छोर पकड़ा दिया जाता है। एक बांस पट्टी पर गुलाबी धागा बंधा रहता है जिसे सुकाल (शुभ) की पट्टी कहते है तथा दूसरी बांस पट्टी पर काला काजल लगा रहता है उसे काल (अशुभ) की पट्टी कहते हैं।

इस दौरान दोनों बच्चे आंख बंद कर नीचे की तरफ सीधे हाथ कर पट्टियों को पकड़े खड़े रहते हैं और साथ में हवन चलता रहता है। ऐसी मान्यता है कि मंत्रोच्चारण से दोनों बालकों में दैवीय भाव उत्पन्न होने पर बांस पट्टियों में हलचल प्रारंभ होने लगती है। इस प्रक्रिया में कभी बांस पट्टी ऊपर की तरफ उठते हुए खंभ के सूल तक पहुंच जाती है या कभी सूल के बीच में स्थित हो जाती है या कभी दोनों बांस पट्टियों में उतार-चढ़ाव भी नजर आता है। इन बांस पट्टियों के उतार चढ़ाव आदि प्रक्रिया को देखकर ही उपस्थित समाज बुजुर्ग मौसम, जमाने, राजनैतिक, काल, सुकाल आदि की भविष्यवाणियां करता है।

इस बार करीब चार घंटे तक चले अनुष्‍ठान के बावजूद कोई ठोस संकेत नहीं मिला और दो बालकों में से एक की तबीयत भी खराब हो गई। इसे देखते हुए घांची समाज के बुजुर्गों ने बताया कि आगे जमाना अच्‍छा होने की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है। उनका कहना है कि इसे प्राकृतिक आपदा का पूर्व संकेत भी माना जा सकता है।

बारहहाल अक्षय तृतीया पर मिले दोनों संकेतों से आगे मौसम के साथ नहीं देने की भविष्‍यवाणी मिल रही है। ऐसे में राज्‍य और केन्‍द्र सरकार को राजस्‍थान के आसन्‍न सूखे के संकट से निपटने के‍ लिए पहले से प्रयास शुरू कर देने चाहिए।