Author: चंद्र प्रभा

दुर्गास्तुति: durgastuti

श्रीमहाभागवत पुराण के अन्तर्गत वेदों द्वारा की गई दुर्गा स्तुति श्रुतय ऊचु: दुर्गे विश्वमपि प्रसीद परमे सृष्ट्यादिकार्यत्रये ब्रह्माद्या: पुरुषास्त्रयो निजगुणैस्त्वत्स्वेच्छया कल्पिता: । नो ते कोsपि च कल्पकोsत्र भुवने विद्येत मातर्यत: क: शक्त: परिवर्णितुं तव गुणाँल्लोके भवेद्दुर्गमान ।।1।। त्वामाराध्य हरिर्निहत्य समरे दैत्यान रणे दुर्जयान त्रैलोक्यं परिपाति शम्भुरपि ते धृत्वा पदं वक्षसि । त्रैलोक्यक्षयकारकं समपिबद्यत्कालकूटं विषं किं ते वा चरितं वयं त्रिजगतां ब्रूम: परित्र्यम्बिके ।।2।। या पुंस: परमस्य देहिन इह स्वीयैर्गुणैर्मायया देहाख्यापि चिदात्मिकापि च परिस्पन्दादिशक्ति: परा । त्वन्मायापरिमोहितास्तनुभृतो यामेव देहस्थिता भेदज्ञानवशाद्वदन्ति पुरुषं तस्यै नमस्तेsम्बिके ।।3।। स्त्रीपुंस्त्वप्रमुखैरुपाधिनिचयैर्हीनं परं ब्रह्म यत् त्वत्तो या प्रथमं बभूव जगतां सृष्टौ सिसृक्षा स्वयम् । सा शक्ति: परमाsपि यच्च समभून्मूर्तिद्वयं शक्तित- स्त्वन्मायामयमेव तेन हि परं ब्रह्मापि शक्त्यात्मकम् ।।4।। तोयोत्थं करकादिकं जलमयं दृष्टवा यथा निश्चय- स्तोयत्वेन भवेद्ग्रहोsप्यभिमतां तथ्यं तथैव धुवम् । ब्रह्मोत्थं सकलं विलोक्य मनसा शक्त्यात्मकं ब्रह्म त- च्छक्तित्वेन विनिश्चित: पुरुषधी: पारं परा ब्रह्मणि ।।5।। षट्चक्रेषु लसन्ति ये तनुमतां ब्रह्मादय: षट्शिवा- स्ते प्रेता भवदाश्रयाच्च परमेशत्वं समायान्ति हि । तस्मादीश्वरता शिवे नहि शिवे त्वय्येव विश्वाम्बिके त्वं देवि त्रिदशैकवन्दितपदे दुर्गे प्रसीदस्व न: ।।6।। ।।इति श्रीमहाभागवते महापुराणे वेदै: कृता दुर्गास्तुति: सम्पूर्णा...

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श्रीसंकटनाशनगणेश स्तोत्रम Shri Sankat Nashan Ganesh Strotam

श्रीसंकटनाशनगणेश स्तोत्रम Shri Sankat Nashan Ganesh Strotam नारद उवाच प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम । भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायु:कामार्थसिद्धये ।।1।। प्रथमं वक्रतुंण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम । तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ।।2।। लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च । सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम ।।3।। नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु गजाननम । एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ।।4।। द्वादशैतानि नामामि त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर: । न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ।।5।। विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम । पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम ।।6।। जपेद गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासै: फलं लभेत । संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।।7।। अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत । तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ।।8।। ।।इति श्रीनारदपुराणे श्रीसंकटनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम।। हिन्दी अनुवाद नारद जी कहते हैं – पार्वतीनन्दन देवदेव श्रीगणेश जी को सिर झुकाकर प्रणाम करके अपनी आयु, कामना और अर्थ की सिद्धि के लिये उन भक्त निवास का नित्यप्रति स्मरण करें – पहला श्लोक. 2 से 5 तक के श्लोक का हिन्दी अनुवाद पहला वक्रतुण्ड, दूसरा एकदन्त, तीसरा कृष्णपिंगाक्ष, चौथा गजवक्त्र, पाँचवां लम्बोदर, छठा विकट, सातवाँ विघ्नराजेन्द्र, आठवाँ धूम्रवर्णं, नवाँ भालचन्द्र, दसवाँ विनायक, ग्यारहवाँ गणपति और बारहवाँ गजानन – इन बारह नामों का जो व्यक्ति तीनों संध्याओं (प्रात:, मध्याह्न और सायंकाल) में पाठ करता है, हे प्रभो ! उसे किसी भी तरह के विघ्न का भय नहीं रहता है. इस प्रकार का स्मरण सभी सिद्धियाँ देने वाला होता है. छठा श्लोक इससे विद्याभिलाषी विद्या, धन के अभिलाषी धन, पुत्र की इच्छा...

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श्रीगणेशद्वादशनामस्तोत्रम

श्रीगणेशद्वादशनामस्तोत्रम सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णक: । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक: ।।1।। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन: । द्वादशैतानि नामानि य: पठेच्छृणुयादपि ।।2।। विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।।3।। ।।इति श्रीगणेशद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम।। हिन्दी अनुवाद सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन, ये सभी गणेश जी के बारह नाम है. जो मनुष्य विद्यारंभ, विवाह, गृहप्रवेश, यात्रा, युद्ध तथा किसी भी संकट के समय इन नामों का पाठ करता है अथवा सुनता है तब उसके काम में विघ्न पैदा नहीं होता है. इस प्रकार से श्रीगणेशद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्ण...

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श्रीगणेश जी के विभिन्न स्वरुप Lord Ganesha

भगवान गणेश – Lord Ganesha सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम । ब्रह्मादिदेवै: परिसेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम ।। हिन्दी अनुवाद भगवान गणेश की अंगकान्ति सिन्दूर के समान है, उनकी दो भुजाएँ हैं, वे लम्बोदर हैं और कमल दल पर विराजमान हैं. ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा में लगे हैं और वे सिद्धसमुदाय से युक्त हैं. ऎसे श्रीगणेशपतिदेव को मैं प्रणाम करता/करती हूँ. गजवक्त्र – Gajavaktra अविरलमदधाराधौतकुम्भ: शरण्य: फणिवरवृतगात्र: सिद्धसाध्यादिवन्द्य: । त्रिभुवनजनविघ्नध्वान्तविध्वंसदक्षो वितरतु गजवक्त्र: संततं मंगलं व: ।। हिन्दी अनुवाद जिनका कुंभस्थल निरंतर बहने वाली मदधारा से धुला हुआ है, जो सब के शरण दाता हैं, जिनके शरीर में...

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गायत्री स्तोत्रम Gayatri strotam

महेश्वर उवाच जयस्व देवि गायत्रि महामाये महाप्रभे । महादेवि महाभागे महासत्त्वे महोत्सवे ।।1।। दिव्यगन्धानुलिप्ताड़्गि दिव्यस्त्रग्दामभूषिते । वेदमातर्नमस्तुभ्यं त्र्यक्षरस्थे महेश्वरि ।।2।। त्रिलोकस्थे त्रितत्वस्थे त्रिवह्निस्थे त्रिशूलनि । त्रिनेत्रे भीमवक्त्रे च भीमनेत्रे भयानके ।।3।। कमलासनजे देवि सरस्वति नमोSस्तु ते । नम: पंकजपत्राक्षि महामायेSमृतस्त्रवे ।।4।। सर्वगे सर्वभूतेशि स्वाहाकारे स्वधेsम्बिके । सम्पूर्णे पूर्णचन्द्राभे भास्वरांगे भवोद्भवे ।।5।। महाविद्ये महावेद्ये महादैत्यविनाशिनी । महाबुद्ध्युद्भवे देवि वीतशोके किरातिनि ।।6।। त्वं नीतिस्त्वं महाभागे त्वं गीस्त्वं गौस्त्वमक्षरम । त्वं धीस्त्वं श्रीस्त्वमोंकारस्तत्त्वे चापि परिस्थिता । सर्वसत्त्वहिते देवि नमस्ते परमेश्वरि ।।7।। इत्येवं संस्तुता देवी भवेन परमेष्ठिना । देवैरपि जयेत्युच्चैरित्युक्ता परमेश्वरि ।।8।। ।। इति श्रीवराहमहापुराणे महेश्वरकृता गायत्रीस्तुति: सम्पूर्णा ।। हिन्दी अनुवाद – 1 से 4 श्लोक तक भगवान महेश्वर बोले – महामाये, महाप्रभे, गायत्रीदेवी आपकी जय हो. महाभागे आपके सौभाग्य, बल व आनन्द सभी असीम है. दिव्य गंध व अनुलेपन आपके श्रीअंगों की शोभा बढ़ाते हैं. परमानन्दमयी देवी, दिव्य मालाएँ व गंध आपके श्रीविग्रह की छवि बढ़ाती हैं. महेश्वरी, आप वेदों की माता हैं. आप ही वर्णों की मातृका हैं. आप तीनों लोकों में व्याप्त हैं. तीनो अग्नियों में जो शक्ति है, वह आपका ही तेज है. त्रिशूल धारण करने वाली देवी, आपको मेरा नमस्कार है. देवी, आप त्रिनेत्रा, भीमवक्त्रा, भीमनेत्रा तथा भयानका आदि अर्थानुरुप नामों से जानी जाती है. आप ही गायत्री और सरस्वती हैं. आपके लिए हमारा नमस्कार है. अम्बिके, आपकी आँखे कमल के समान हैं. आप महामाया हैं. आप से अमृत की वृष्टि होती रहती है. 5 से 7 श्लोक...

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