जातक के सामने कुण्‍डली (kundli) लेकर बैठे ज्‍योतिषी (Astrologer) के सामने दो चुनौतियां एक साथ होती हैं। एक तो उसे यह प्रदर्शित करना होता है कि वह दुनिया में सबकुछ जानने वाला बंदा है, दूसरा उसका परमात्‍मा से सीधा संबंध है, ऐसे में वह आपके सभी पुराने कर्मों का लेखा-जोखा “सैट” कर देगा।

एक अकेला ज्‍योतिषी इतनी बड़ी इमेज नहीं बना सकता। जाहिर सी बात है दुनिया के हजारों ज्‍योतिषियों ने मिलकर इस धारणा का पोषण किया होगा और लाखों जातकों ने सहमति में सिर धुने होंगे, तब कहीं जाकर यह धारणा बैठ पाई होगी कि ज्‍योतिषी जातक के भाग्‍य के साथ जैसे चाहे खेल सकता है। सोते को खड़ा कर सकता है, रोते को हंसा सकता है और भी बहुत कुछ।

जातक कुण्‍डली से कई प्रकार की गणनाएं संभव हैं। आमतौर पर प्रसिद्ध सवालों का विश्‍लेषण जातक कुण्‍डली से किया जाता है। देवकीनन्‍दन सिंह की पुस्‍तक ज्‍योतिष रत्‍नाकर ने बहुत खूबसूरती के साथ इन सवालों को प्रवाह नाम दिया और जीवन के आठ प्रवाह बनाकर यह तय कर दिया कि कौनसी वय का व्‍यक्ति कौनसे सवाल पूछ सकता है और उनके हल कैसे निकाले जाएंगे।

जीवन की प्रथम तरंग बाल्‍यावस्‍था (Childhood) है। तब अधिकांश सवाल बालारिष्‍ट यानी बचपन में किसी हादसे से मृत्‍यु अथवा अंग भंग की आशंका तो नहीं है, बालक का स्‍वास्‍थ्‍य कैसा रहेगा। फिर पढ़ाई को लेकर सवाल होते हैं, इसके बाद नौकरी, विवाह, संतान, धन, मकान, संतति का विवाह, वृद्धावस्‍था के रोग और आखिर में मृत्‍यु। 

अधिकांश जातकों को जो सवाल निहायत निजी (Personal) लगते हैं, वे सबसे कॉमन (Common) सवाल होते हैं। इन्‍हें देखने के लिए निश्चित सिद्धांत हैं। अगर तरतीब से सिद्धांतों का अनुसरण किया जाए और ज्‍योतिषी की अंत:प्रज्ञा सही काम करे तो जवाब भी सटीक आते हैं।

कई बार सही तरीके से चल रही गाड़ी पटरी से उतर जाती है। आमतौर पर ऐसी स्थिति राहू की दशा, अंतरदशा, सूक्ष्‍म अंतर के दौरान आती है। इसके अलावा केतू, चंद्रमा, शनि और मंगल के योग, दुर्योग और दशा-अंतरदशा का क्रम भी ऐसी स्थितियां पैदा करते हैं। यह स्थिति जीवन की किसी भी तरंग के दौरान हो सकती है।

पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष जिसमें पाराशर से जैमिनी तक के विश्‍लेषण उपलब्‍ध हैं, बताती है कि समस्‍या कहां से शुरू हुई है।

उपचारों की भूमिका (Upchaar)

आमजन में यह मान्‍यता बन गई है कि ज्‍योतिषी खराब ग्रहों का उपचार बताने वाला होता है। सही मायनों में देखा जाए तो ज्‍योतिषी भूमिका जातक को उसके अच्‍छे और खराब ग्रहों के बारे में जानकारी देने के साथ ही खत्‍म हो जाती है। पर, जातक इतने भर से संतुष्‍ट नहीं हो सकता। एक बार उसे बता दिया जाए कि अमुक समय से जातक का खराब समय चल रहा है, फलां प्रकार की समस्‍याएं सामने आ रही हैं और आने वाले इतने दिनों तक समस्‍या बनी रहने की आशंका है। 

अब जातक चाहता है कि खराब समय को दुरुस्‍त करने का उपचार ज्‍योतिषी ही बता दे। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष (Traditional hindu astrology) में जातक के खराब समय को पूर्व जन्‍मों के कर्मों का फल माना गया है। उस काल में जातकों को पूर्व जन्‍मों के कर्मफलों के खराब प्रभाव को कम करने के लिए प्रायश्चित का प्रावधान किया गया। इसके तहत पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन और दान का प्रावधान किया गया।

ऐसा माना गया कि इससे जातक के पिछले जन्‍मों के बंधन छूटते जाते हैं। आज भी अन्‍य किसी उपचार की तुलना में ये उपचार कहीं अधिक प्रभावी नजर आते हैं। हालांकि उपचार की पद्धतियां और इनके प्रभावों का मूल ज्‍योतिष विश्‍लेषण से सीधा संबंध नहीं है, फिर भी जातक का आग्रह दोनों को एक ही श्रेणी में ला खड़ा करता है। 

किसी ऑर्गेनिक रिएक्‍शन (Organic reaction) की तरह ये उपचार भी धीरे धीरे काम करते हैं और जातक की स्थिति में नियमित सुधार करते हुए उसे जीवन में बेहतरी की ओर ले जाते हैं। कुछ जातक अधिक जल्‍दी में होते हैं, वे चाहते हैं कि जिस दिन उपचार बताया जाए, उसी दिन से अब तक हुई समस्‍याओं का समाधान हो जाए। ऐसे में कालान्‍तर में तांत्रिक और लाल किताब जैसे फौरी उपचार प्रचलन में आए।

समस्‍याएं और समाधान

जातक कुण्‍डली को देखना शुरू करने से पहले ही कई तरह की समस्‍याएं सामने आती हैं। इनमें प्रमुख है जन्‍म समय का सही होना। जो भी जातक कुण्‍डली लेकर ज्‍योतिषी के पास आता है, वह सटीक फलादेश चाहता है, लेकिन इस बात की गारंटी देने के लिए तैयार नहीं होता है कि उसका जो जन्‍म समय बताया गया है वह मिनटों तक सही है।

मैंने तो यह तक देखा है कि जो अधिक दावा करते हैं, आमतौर पर उनकी कुण्‍डली गलत ही निकलती है, केवल अपनी जिद को प्रदर्शित करने के लिए वे ज्‍योतिषी (Astrologer) पर दबाव डालते हैं कि वह जो समय बता रहा है वह सौ प्रतिशत सही है। ऐसे में स्‍थूल फलादेश (General prediction) फिर भी सही मिल जाते हैं, लेकिन घटनाओं की समय अवधि और सूक्ष्‍म वर्णन आमतौर पर सही नहीं मिल पाते हैं।

उनमें कई बार तो महीनों तक का अंतर आ जाता है। एक लग्‍न तीस अंशों का होता है। अगर जन्‍म समय शुरूआती अंशों या आखिरी अंशों में हो तो लग्‍न बदलनें की आशंका प्रबल हो जाती है। ऐसे में जन्‍म समय को लेकर अधिक सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है। अगर लग्‍न मध्‍य में हो यानी 7-8 डिग्री से 25-26 डिग्री तक, तो एक निश्चिंतता रहती है।

शुरूआती दौर में गलत कुण्‍डलियों (Kundali) की ऐसी समस्‍या हर दूसरे तीसरे जातक के साथ आती थी। ऐसे में गुरुजी ने एक सरल पद्धति बताई जिससे इस समस्‍या का फौरी समाधान निकाला जा सकता है। वह यह कि जब भी जातक कुण्‍डली लेकर आए, उसी समय प्रश्‍न कुण्‍डली भी बना लो।

अगर प्रश्‍न कुण्‍डली और जातक का प्रश्‍न उसकी जन्‍म कुण्‍डली के अनुसार मैच होता है तो जातक की लग्‍न कुण्‍डली को सही मान लिया जाए। इस फौरी समाधान से अस्‍सी प्रतिशत तक कुण्‍डलियों को जांचने का काम निपट जाता है। (प्रश्‍न कुण्‍डली पर पूर्व में लिख चुका हूं, इस सीरीज के आगे के लेखों में एक बार फिर कुछ बताने का प्रयास करूंगा)

जन्‍म समय सही मिल जाने और कुण्‍डली की जांच के बाद उसके फलादेश का काम शुरू होता है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष (Traditional vedic astrology) में लग्‍न कुण्‍डली (जो कुण्‍डली पहले पन्‍ने पर बनी हुई होती है) के सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए उसके टुकड़े राशियों के आधार पर किए गए हैं। इसी को नवमांश, (Navmansha) दशमांश या द्वादशांश कहते हैं। इसमें लग्‍न की राशि के अंशों के आधार पर विभाग कर बाकी की कुण्‍डली तैयार कर ली जाती है।

बैंगलोर के प्रसिद्ध ज्‍योतिषी प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति (KP) ने राशि के आधार पर अंशों में विभाजन की पद्धति को पूर्णतया नकार दिया और सूक्ष्‍म विश्‍लेषण के लिए एक नई पद्धति ईजाद की, जो पाराशरीय सिद्धांत पर आधारित थी। ऋषि पाराशर ने विंशोतरी दशा पद्धति (जिसे आप दशा (Dasha) के नाम से जानते हैं) बनाई।

इसमें चंद्रमा के नक्षत्र चार के आधार पर एक व्‍यक्ति के जीवनकाल को 120 साल मानकर हर ग्रह को एक निश्चित दशा का आधार दिया। दशाओं के टुकड़े भी उसी अनुपात में किए गए। इसे अंतरदशा कहा गया। अष्‍टोत्‍तरी एवं अन्‍य दशा सिस्‍टम की तुलना में विंशोत्‍तरी दशा पद्धति (Vimshottari dasha system) अधिक सटीक और वैज्ञानिक लगता है।

केएस कृष्‍णामूर्ति ने पाराशरीय सिद्धांत की पालना करते हुए हर राशि और भाव के उसी के अनुसार टुकड़े कर दिए। ऐसे में 27 नक्षत्रों के 9-9 टुकड़े हुए। पूरी कुण्‍डली के 360 डिग्री को 249 भागों में बांट दिया गया। पारम्‍परिक पद्धति की तुलना में यह पद्धति अधिक सटीक लगती है। इसमें लग्‍न कुण्‍डली का ही विश्‍लेषण पर्याप्‍त है।

नवमांश, त्रिशांश, दशमांश आदि का विश्‍लेषण अलग से करने और उनके सिद्धांत याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे में वर्तमान दौर में पारम्‍परिक की तुलना में केपी सिस्‍टम के ज्‍योतिषियों की संख्‍या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।

अगर आप केपी सिस्‍टम को जानना चाहते हैं तो कृष्‍णामूर्ति पद्धति की कुल जमा छह पुस्‍तकों में से प्रथम पुस्‍तक “कास्टिंग द होरोस्‍कोप” (Casting the horoscope) ले आएं। इसमें कुण्‍डली बनाने, दशाओं को निकालने और सूक्ष्‍म टुकड़े किए जाने की पद्धति विस्‍तार से दी गई है।